विवाह संस्था में परिवर्तन एवं स्थायित्व का संकट

लेखक

  • डाॅ. इन्द्र सिंह राठौड़

सार

विवाह मानव समाज की एक प्रमुख सामाजिक संस्था है। जिसका उद्देश्य केवल दो व्यक्तियों का सामाजिक और वैधानिक सम्बन्ध स्थापित करना ही नहीं बल्कि दो परिवारों, समुदायों और संस्कृतियों को जोड़ती है। विवाह संस्था परिवार का निर्माण, सन्तानों का लालन-पालन व सामाजिक व्यवस्था को बनाती है। विवाह एक पवित्र संस्कार है। हिन्दू धर्म में विवाह को सोलह संस्कारों में से एक महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है। परम्परागत समाज में विवाह को एक स्थायी धार्मिक एवं सामाजिक दायित्व के रूप में देखा जाता था किन्तु आधुनिक समय में औद्योगीकरण, नगरीकरण, शिक्षा के प्रसार, महिला सशक्तिकरण एवं वैश्वीकरण के कारण विवाह संस्था के स्वरूपों में पविर्तन आए है। इन परिवर्तनों से विवाह की स्थिरता का संकट उत्पन्न हुआ है। समाज में तलाक की बढती दर, विवाह की आयु में वृद्धि, लिव इन रिलेशनशिप का बढना जैसे अनेक परिणाम उत्पन्न हो रहे है। यह शोध पत्र विवाह संस्था के परिवर्तनों एवं स्थायित्व पर उत्पन्न संकट का समाजशास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

##submission.authorBiography##

डाॅ. इन्द्र सिंह राठौड़

सहायक आचार्य, समाजशास्त्र 
बी.एन.पी.जी. गर्ल्स काॅलेज, राजसमन्द
rathore.isr77@gmail.com

##submission.downloads##

प्रकाशित

2026-03-13

अंक

खंड

Articles