सिल्वर स्क्रीन की शिल्पकार: वे स्त्रियां जो दिखाई नहीं देतीं

लेखक

  • डॉ. मो. आरिफ अंसारी

सार

पितृसत्तात्मक चुनौतियों के बावजूद, फातिमा बेगम (भारत की पहली महिला निर्देशक, 1926) से लेकर समकालीन फिल्म निर्माताओं जैसे जोया अख्तर, मेघना गुलजार और पायल कपाड़िया तक, महिलाओं ने फिल्म निर्माण के हर रचनात्मक और तकनीकी क्षेत्र, निर्देशन, पटकथा लेखन, संपादन, छायांकन और निर्माण में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। लेख में मीरा नायर और दीपा मेहता के वैश्विक सिनेमा, हनी ईरानी और जूही चतुर्वेदी की यथार्थवादी पटकथाओं, आरती बजाज के संपादन कौशल, बी.आर. विजयलक्ष्मी और अंजुली शुक्ला के छायांकन में pioneering कार्य, तथा ऑस्कर विजेता भानु अथैया के कॉस्ट्यूम डिजाइन पर प्रकाश डाला गया है। यह अध्ययन स्थापित करता है कि इन महिलाओं ने सिनेमा को केवल मनोरंजन के माध्यम से आगे बढ़ाकर सामाजिक बदलाव का सशक्त उपकरण बना दिया है, जहाँ महिला पात्र अपनी कहानी की रचयिता हैं। निष्कर्ष यह है कि भारतीय फिल्म जगत में यह 'मूक क्रांति' महिलाओं के नेतृत्व को सर्वोपरि स्थान देती है, जिसके बिना भविष्य का सिनेमा अधूरा है।

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डॉ. मो. आरिफ अंसारी

असिस्टेंट प्रोफेसर

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प्रकाशित

2026-03-11

अंक

खंड

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