नशाखोरी की समस्या: समाजशास्त्रीय नजरिए से एक विश्लेषण

लेखक

  • रोहित कुमार यादव शिक्षक, सामाजिक विज्ञान

सार

आज का समाज नशे की गिरफ्त में इतना जकड़ा हुआ है कि यह समस्या न केवल व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित कर रही है, बल्कि परिवार की नींव और सामाजिक संरचना को भी हिला रही है। भारत में नशाखोरी की जड़ें प्राचीन परंपराओं में हैं, जहां मादक पदार्थों का इस्तेमाल धार्मिक अनुष्ठानों या सांस्कृतिक रिवाजों तक सीमित था। लेकिन आधुनिक दौर में यह एक अनियंत्रित महामारी बन चुकी है, जो स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और सामाजिक सद्भाव को चोट पहुंचा रही है। भारत की भौगोलिक स्थिति इसे ड्रग्स के व्यापार के लिए संवेदनशील बनाती है, क्योंकि यह दो प्रमुख ड्रग उत्पादक क्षेत्रों के बीच स्थित है। इन क्षेत्रों से आने वाले मादक पदार्थ देश में उपभोक्ताओं और तस्करों के बीच एक पुल बनाते हैं। आधुनिक समाज में शराब, हेरोइन, कोकीन और सिंथेटिक ड्रग्स का बढ़ता चलन स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों के साथ-साथ सामाजिक विघटन को भी बढ़ावा दे रहा है। नशाखोरी से घरेलू हिंसा, अपराध और गरीबी जैसी समस्याएं जन्म ले रही हैं, और यह युवाओं के भविष्य को भी खतरे में डाल रही है। नशे की लत से प्रभावित व्यक्ति न केवल शारीरिक रूप से कमजोर होता है, बल्कि मानसिक विकारों का शिकार भी बनता है, जो समाज पर बोझ बन जाता है।

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प्रकाशित

2025-09-30