आरुणाचल प्रदेश के हिंदी उपन्यासों में स्त्री का प्रतिबिंब

लेखक

  • सोनाली गुप्ता शोध छात्रा

सार

आरुणाचल प्रदेश की भूमि विविधताओं से भरी हुई है, जहां दर्जनों जनजातियां अपनी अनोखी संस्कृतियों और बोलियों के साथ सहअस्तित्व में रहती हैं। इन जनजातियों की जीवनशैली, रीति-रिवाज और भाषाएं भले ही अलग-अलग हों, लेकिन हिंदी भाषा उन्हें एक सूत्र में बांधती है, जैसे कोई अदृश्य धागा जो विविध रंगों को एक चित्र में बदल देता है। इस प्रदेश में हिंदी साहित्य का विकास धीरे-धीरे हुआ है, लेकिन इसमें स्त्री की स्थिति का चित्रण इतना गहरा और मार्मिक है कि वह पाठक के मन को झकझोर देता है। यहां की हिंदी उपन्यासों में स्त्री को न केवल एक चरित्र के रूप में उकेरा गया है, बल्कि उसकी पीड़ा, संघर्ष और आकांक्षाओं को समाज की कठोर वास्तविकताओं के साथ जोड़ा गया है। इन रचनाओं में स्त्री की दशा कहीं दयनीय है, कहीं विद्रोही, लेकिन हर जगह वह पुरुष-प्रधान व्यवस्था की शिकार नजर आती है। यह कहानी उन उपन्यासों की है जो आरुणाचल की पृष्ठभूमि में रचे गए हैं, और जिनमें स्त्री का अस्तित्व एक सवाल की तरह उभरता है क्या वह सिर्फ एक वस्तु है, या उसकी अपनी पहचान भी है?

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गुवाहाटी विश्वविद्यालय

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प्रकाशित

2026-01-22