मीरा के काव्य में भक्ति-भावना : प्रेम, समर्पण और आध्यात्मिक चेतना का अनुशीलन
Abstract
हिंदी भक्ति साहित्य के इतिहास में मीरा का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। उन्होंने अपनी काव्य-साधना के माध्यम से भक्ति को केवल धार्मिक आस्था तक सीमित न रखकर उसे प्रेम, आत्मसमर्पण, स्वतंत्र चेतना और आध्यात्मिक अनुभूति का व्यापक स्वरूप प्रदान किया। मीरा की भक्ति का केंद्र श्रीकृष्ण हैं, जिन्हें वे अपने आराध्य, प्रियतम और जीवन के सर्वस्व के रूप में स्वीकार करती हैं। उनके पदों में विरह, मिलन, प्रेम, समर्पण, लोकलाज की उपेक्षा तथा सांसारिक बंधनों से मुक्ति की तीव्र आकांक्षा दिखाई देती है। मीरा की भक्ति मूलतः सगुण कृष्णभक्ति है, किंतु उसमें व्यक्तिगत प्रेमानुभूति और आत्मिक स्वतंत्रता का ऐसा समन्वय है जो उसे विशिष्ट बनाता है। प्रस्तुत शोध-पत्र में मीरा की भक्ति भावना के विभिन्न आयामों, उनके काव्य में व्यक्त प्रेम एवं विरह, पूर्ण समर्पण, सामाजिक रूढ़ियों के प्रतिरोध तथा आध्यात्मिक चेतना का विश्लेषण किया गया है।
बीज शब्द: मीरा, भक्ति, कृष्ण, प्रेम, विरह, समर्पण, आध्यात्मिक चेतना, भक्तिकाल।



