नाट्यशास्त्र में वर्णित ‘चारी-विधान’ कथक नृत्य के संदर्भ में
Abstract
भारतीय शास्त्रीय नाट्य एवं नृत्य परंपरा में नाट्यशास्त्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। भरतमुनि द्वारा रचित यह ग्रंथ भारतीय सौंदर्यशास्त्र तथा अभिनय-कला का मूल आधार माना जाता है। प्रस्तुत शोध पत्रिका का विषय “नाट्यशास्त्र में वर्णित ‘चारी-विधान’ कथक नृत्य के संदर्भ में” है। यह अध्ययन मुख्यतः नाट्यशास्त्र के दशम एवं एकादश अध्याय पर आधारित है, जिनमें पाद, जंघा, ऊरु तथा कटि की गतियों और चारी-विधान का विस्तृत वर्णन मिलता है।
नाट्यशास्त्र के अनुसार पाद, जंघा, ऊरु और कटि की समन्वित एवं लयबद्ध गति को ‘चारी’ कहा जाता है। चारी केवल चलने की क्रिया नहीं, बल्कि सौंदर्यपूर्ण एवं भावात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम है। भरतमुनि ने चारियों को दो वर्गों, भौमी चारी और आकाशिकी चारी में विभाजित किया है तथा प्रत्येक के 16 प्रकार बताए हैं। भौमी चारियाँ भूमि पर आधारित होकर स्थिरता, संतुलन और लय को व्यक्त करती हैं, जबकि आकाशिकी चारियाँ उन्नयन, ऊर्जा और विस्तार का संकेत देती हैं।
शोध पत्रिका में यह स्पष्ट किया गया है कि कथक नृत्य में चारी-विधान आज भी जीवंत रूप में विद्यमान है। विच्यवा चारी का संबंध तत्कार की पाद-प्रहार प्रक्रिया से तथा नूपुरपादिका चारी का प्रयोग खड़े तत्कार में देखा जा सकता है। इसी प्रकार सूचीचारी, ऊर्ध्वजानु और हरिणप्लुता जैसी आकाशिकी चारियाँ कथक के अभिनय एवं गतिविन्यास में प्रयुक्त होती हैं। यह अध्ययन बताता है कि चारी-विधान कथक की तकनीक, अभिव्यक्ति और शास्त्रीय परंपरा को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार है। शोधकर्ता ने भौमी और आकाशिकी चारियों के स्वरूप, उनके लक्षण तथा कथक में उनके प्रयोग का तुलनात्मक अध्ययन किया है।
कीवर्ड्स
कथक, नाट्य शास्त्र, चारी, पाद- भेद, पादाभिनय, आंगिक अभिनय, भौमीचारी, आकाशिकी चारी



